हमारे बारे में (About Us)
गोस्वामी तुलसीदास जी विरचित पावन श्री हनुमान चालीसा का विशुद्ध, प्रामाणिक, विज्ञापन-रहित और बहुभाषी डिजिटल मंदिर।
गीता प्रेस गोरखपुर प्रामाणिकता
इंटरनेट पर प्रचलित अशुद्धियों और अनधिकृत पाठभेदों से परे, हमारी संपूर्ण सामग्री गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३) के प्रामाणिक मूल अवधी संस्करण से अक्षरशः सत्यापित है। मूल 43 छंदों (२ आरंभिक दोहे, ४० चौपाई, १ समापन दोहा) की पवित्रता से कोई समझौता नहीं किया गया है।
१० भारतीय लिपियों में सुलभ
भक्ति किसी भाषा की सीमा में नहीं बंधती। यह पावन स्तुति देवनागरी (हिन्दी), गुजराती, मराठी, बंगाली, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी (गुरुमुखी) एवं अंग्रेज़ी (IAST ध्वन्यात्मक प्रतिलेखन) में उपलब्ध है ताकि प्रत्येक भक्त अपनी मातृलिपि में भावपूर्वक पाठ कर सके।
शून्य विज्ञापन एवं शुद्ध शांति
प्रार्थना के समय मन की एकाग्रता सर्वोपरि है। हमारी वेबसाइट पर कोई पॉपअप, विज्ञापन, गूगल ट्रैकर अथवा व्यावसायिक तत्व नहीं है। यह पूर्णतः निःशुल्क और लोक-कल्याण के भाव से निर्मित आध्यात्मिक सेवा है।
वरिष्ठ भक्तों हेतु सुगम डिज़ाइन
हमारे माता-पिता एवं वरिष्ठ भक्तों के नेत्रों के सुखद अनुभव के लिए विशाल अक्षर आकार (Normal, Large, Extra Large, Devotee/Elderly 34px), ४ सुखद रंग विकल्प (दिन, चंदन सेपिया, रात्रि मंदिर, उच्च विषमता), और १-क्लिक A4 PDF प्रिंट की सुविधा उपलब्ध है।
श्री हनुमान चालीसा का दिव्य इतिहास
श्री हनुमान चालीसा की रचना 16वीं शताब्दी में महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब तत्कालीन मुगल सम्राट द्वारा तुलसीदास जी को कारागार में बंदी बनाकर चमत्कार दिखाने को कहा गया, तब उन्होंने एकाग्रचित्त होकर पवनपुत्र हनुमान जी की पावन स्तुति में यह 40 चौपाइयां रची थीं।
यह केवल एक काव्य नहीं अपितु भक्ति, शक्ति, विवेक और शरणागति का महामंत्र है। चौपाई 38 में तुलसीदास जी स्वयं प्रमाणित करते हैं: "जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा, होय सिद्धि साखी गौरीसा।"