श्री हनुमान चालीसा — पवित्र पाठ, अर्थ, और नित्य सुमिरन

छंद संख्या: 1 / 43•प्रारंभिक दोहा १
प्रारंभिक दोहा १

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥

shreeguru charana saroja raja nija manu mukuru sudhaari।
baranaun raghubara bimala jasu jo daayaku phala chaari॥

सरल भावार्थ

श्री गुरु महाराज के चरण-कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का गान करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों फलों को देने वाला है।

संक्षेप: गुरु के चरणों की वंदना कर मन को शुद्ध करते हुए भगवान राम के पावन चरित्र का स्मरण, जो जीवन के चारों फल प्रदान करता है।

श्रीगुरु: पूज्य गुरुदेवचरन सरोज रज: चरण कमलों की धूलमनु मुकुरु: मन रूपी दर्पणसुधारि: स्वच्छ व पवित्र करके

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॥ इति श्रीहनुमानचालीसा समाप्ता ॥

भगवान हनुमान जी आपके और आपके परिवार के जीवन में बल, बुद्धि एवं सुख-शांति का संचार करें।

श्री हनुमान चालीसा

पवित्र पाठ, अर्थ, और नित्य सुमिरन

प्रामाणिक मूल पाठ: गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३)

गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३) प्रामाणिक मूल पाठ, शब्दार्थ एवं पारंपरिक अवधी भावार्थ।