॥ श्री हनुमान चालीसा ॥
मूल रचना: गोस्वामी तुलसीदास | गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३) प्रामाणिक पाठ
https://www.dailyhanumanchalisa.com — सम्पूर्ण ४३ छंद (२ दोहे, ४० चौपाई, १ समापन दोहा)
श्री हनुमान चालीसा — पवित्र पाठ, अर्थ, और नित्य सुमिरन
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
shreeguru charana saroja raja nija manu mukuru sudhaari।
baranaun raghubara bimala jasu jo daayaku phala chaari॥
श्री गुरु महाराज के चरण-कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का गान करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों फलों को देने वाला है।
संक्षेप: गुरु के चरणों की वंदना कर मन को शुद्ध करते हुए भगवान राम के पावन चरित्र का स्मरण, जो जीवन के चारों फल प्रदान करता है।
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॥ इति श्रीहनुमानचालीसा समाप्ता ॥
भगवान हनुमान जी आपके और आपके परिवार के जीवन में बल, बुद्धि एवं सुख-शांति का संचार करें।
श्री हनुमान चालीसा
पवित्र पाठ, अर्थ, और नित्य सुमिरन
प्रामाणिक मूल पाठ: गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३)
गीता प्रेस गोरखपुर (कोड ६३) प्रामाणिक मूल पाठ, शब्दार्थ एवं पारंपरिक अवधी भावार्थ।