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प्रारंभिक दोहा १
प्रारंभिक दोहा १ भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या
श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि॥
shreeguru charana saroja raja nija manu mukuru sudhaari।
baranaun raghubara bimala jasu jo daayaku phala chaari॥
सरल भावार्थ
गुरु के चरणों की वंदना कर मन को शुद्ध करते हुए भगवान राम के पावन चरित्र का स्मरण, जो जीवन के चारों फल प्रदान करता है।
शब्दार्थ
| अवधी शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| श्रीगुरु | पूज्य गुरुदेव |
| चरन सरोज रज | चरण कमलों की धूल |
| मनु मुकुरु | मन रूपी दर्पण |
| सुधारि | स्वच्छ व पवित्र करके |
| बरनउँ | वर्णन करता हूँ |
| रघुबर बिमल जसु | श्री राम का निर्मल यश |
| फल चारि | चार फल (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) |