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समापन दोहा
समापन दोहा भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या
पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥
pavanatanaya smkata harana mmgala moorati roopa।
raama lakhana seetaa sahita hridaya basahu sura bhoopa॥
सरल भावार्थ
हे पवनसुत, संकटमोचन, मंगलमूर्ति! श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण सहित आप सदा मेरे हृदय में विराजें।
शब्दार्थ
| अवधी शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| पवनतनय | पवन के पुत्र |
| संकट हरन | कष्टों को दूर करने वाले |
| मंगल मूरति रूप | कल्याण और शुभ के साक्षात स्वरूप |
| सुर भूप | देवताओं के स्वामी |